BREECH-MEANING-IN-HINDI

Breech meaning in hindi: क्या होता है ब्रीच बेबी?

सविता भल्ला को अपनी तीसरी तिमाही में अल्ट्रासाउंड द्वारा पता चला की उनका बच्चा ब्रीच पोज़िशन (breech meaning in hindi) में है| वह कहती है “जब मेरे गायनोकोलॉजिस्ट ने मुझे बताया की ऐसी स्तिथि में सिज़ेरियन ही डिलिवरी का सबसे उचित तरीका है, तो मैं घबरा गई।  मैंने तुरंत इंटरनेट पर ऐसे डॉक्टर की तलाश की जो सिज़ेरियन को बढ़ावा न दे|” सविता की यह पहली प्रेगनेंसी थी और वह एक नार्मल डिलीवरी के लिए ही इच्छुक थी| 

उनकी खोज डॉ अनीता सभरवाल पर जाकर रुकी, जो सीताराम भारतिया हॉस्पिटल की सीनियर गयनेकोलॉजिस्ट है, और जिन्हे महिलाएं आशावादी और भारोसा दिलाने वाली मानते है।   

सविता ने डॉ अनीता से पूछे कुछ ज़रूरी सवाल| 

ब्रीच बेबी क्या होता है? (Meaning of breech in Hindi)

गर्भावस्था के दौरान शिशु अपनी जगह बदलता रहता है । तीसरी तिमाही में आमतौर पर शिशु का सर नीचे की तरफ और पैर ऊपर की तरफ हो जाते है और शिशु जन्म के लिए तैयार हो जाता है | इससे सेफालिक (cephalic) पोज़िशन कहा जाता है |

मगर कई बार शिशु का सर ऊपर की तरफ ओर पैर नीचे की तरफ हो जाते है, जिसको ब्रीच प्रेसेन्टेशन (breech presentation) कहते है| 

डॉ अनीता  सविता  को  असामान्य प्रेसेन्टेशन (Abnormal Presentation) के बारे में समझाते हुए कहती है कि इस स्थिति में शिशु प्रमुख रूप से दो पोज़िशन में हो सकता है:

  • ब्रीच (breech meaning in hindi) जिसमे शिशु का नीचला हिस्सा पहले या पैर नीचे की तरफ हो या  
  • ट्रांस्वर्स पोज़िशन (transverse position) यानी शिशु आड़ी या तिरछी स्थिति में हो

डॉ अनीता कहती है “ध्यान में रखने वाली बात यह है कि शिशु अपनी पोज़िशन गर्भावस्था के दौरान बदलता रहता है।”   

सविता उत्सुक हुई  यह जानने के लिए की वह  ऐसा क्या कर सकती है जिससे शिशु नार्मल पोज़िशन में आ जाए| 

क्या  Breech position of baby (in hindi)  को बदला जा सकता है? 

डॉ अनीता  का कहना है “बहुत से मामलों में हमे कुछ भी करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्यूंकि बच्चा अपने आप cephalic पोज़िशन में आ जाता है (spontaneous version)| “

कई बार एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट की निगरानी में व्यायाम द्वारा बच्चे को नार्मल जगह पर लाया जा सकता है| 

लेकिन अगर शिशु 36वें या 37वें सप्ताह तक भी पोज़िशन नहीं बदलता, तो इसमें घबराने की बात नहीं है|  कुछ ब्रीच पोज़िशन में, बच्चे को सही पोज़िशन में लाने के लिए External Cephalic Version (ECV) की तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है| यह प्रक्रिया अल्ट्रसाउन्ड की  निगरानी में एक डॉक्टर द्वारा की जाती है। इसमें डॉक्टर हाथ से बच्चे को सीधा करने में मदद कर सकता है।

यह प्रक्रिया सुरक्षित मानी जाती है मगर माँ को थोड़ी तकलीफ का सामना करना पड़ सकता है| 

लगभग 50% मामलों में ECV प्रक्रिया सफल रहती है और बच्चे का जन्म नॉर्मल डिलीवरी द्वारा हो पाता है| 

डॉ अनीता का कहना है “जो बच्चे ECV द्वारा जगह बदल लेते है, उनके प्रसव के दौरान ज़्यादातार कोई बाधा नहीं आती| मगर जिन का  ECV सफल नही होता, उन्हें अपने डाॅकटर की सलाह लेनी चाहिए|”  

सविता को अपने ब्रीच बेबी को लेकर आशा की किरण दिखी |

उन्होंने पुछा अपना अगला सवाल |

“क्या ब्रीच बेबी के साथ नार्मल डिलीवरी संभव है?”

डॉ अनीता सविता को आश्वासन देते हुए कहती है  “गर्भ में बच्चा अपनी पोज़िशन बदल सकता है| जब तक कोई चिकित्सीय संकेत ना हो, तब तक हम सिज़ेरियन को बढ़ावा नहीं देते है|”

ऐसे कम ही स्तिथि है जिनमे शिशु ब्रीच पोज़िशन (breech meaning in hindi) में ही रह जाता है।  इस स्तिथि में सिज़ेरियन करनी पड़ती है क्यूंकि नॉर्मल डिलीवरी के समय शिशु का सर अटकने का खतरा होता है ।

यह सुनकर सविता निश्चिंत हुई| उन्होंने फ़ैसला किया कि वह इसी डॉक्टर के साथ आगे बढ़ेंगी। 

उन्होंने फ़िज़ियोथेरेपिस्ट की सलाह से ऊंट और बिल्ली व्यायाम भी करें।

इस बातचीत को एक सप्ताह हुआ भी नहीं था कि सविता को 38 सप्ताह में प्रसव पीढ़ा होने लगा । जॉंच के समय देखा गया कि बच्चा उलटे पोज़िशन से सीधा हो गया था। सविता कि बिना किसी बाधा के नॉर्मल डिलिवरी हुई।

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